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नवजात शिशु के पहले 24 घंटे | नवजात की आवश्यकता | किन किन बातों का ध्यान रखें – Part 2

एक नवजात बच्चे को एक माता द्वारा किन-किन चीजों की आवश्यकता होती है. उसे क्या क्या करना चाहिए. साथ ही साथ हमने बताया था कि जब बच्चे को समाज में लाया जाता है तो सामाजिक व्यक्तियों द्वारा किन किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होता है.

 

आज हम बात करेंगे कि एक नवजात बच्चे को किन-किन टेस्टों की आवश्यकता होती है, ताकि इस बात का पता लगाया जा सके कि बच्चा स्वस्थ है, या उसे किसी प्रकार की समस्या तो नहीं.  

 



दोस्तों आजकल ट्रेंड बन गया है, कि बच्चा जब भी पैदा होता है, तो किसी डॉक्टर की देखरेख में ही पैदा होता है.

आजकल घरों पर बच्चे काफी कम पैदा होते हैं. मेडिकल साइंस ने कुछ छोटी-छोटी बातें बताई है. जिन बातों को नवजात शिशु के साथ जरूर देखना चाहिए. यह उसके स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से काफी जरूरी होती है.

 

दोस्तों वैसे तो डॉक्टर जब बच्चे को पैदा करवाते हैं, तो तुरंत ही नवजात शिशु के साथ जो भी टेस्टिंग की जाती है. बच्चे की सेहत को लेकर वह उसे अपने आप ही कर लेते हैं. लेकिन आपको भी इन बातों का पता होना जरूरी है. अगर कुछ गलती से रह जाए तो आप यह अपने डॉक्टर को बता सकते हैं कि आप इस चीज को भेज जरूर चेक करें. या आप डॉक्टर से बच्चे की परफॉर्मेंस उसके टेस्टों के बारे में भी जान सकते हैं.

 

 

बच्चे के जन्म के बाद कुछ कार्य है, जो डॉक्टर तुरंत करते हैं.  इसमें डॉक्टर बच्चे के मुंह और नाक से म्यूकस और एमनियोटिक द्रवको साफ करके सेक्शन करते हैं, जिससे कि बच्चा खुद से सांस लेना शुरू कर सकें. बच्चे के जन्म लेने के 1 मिनट से लेकर 5 मिनट तक बच्चे की हार्ट बीट या सांस लेना भी नापा जाता है.

 

जन्म के बाद बच्चे का एप्गार स्कोर चेक करते हैं.  यह टेस्ट बताता है कि जन्म के बाद नई दुनिया से बच्चा कैसे एडजस्ट कर रहा है.  इसका मापन जन्म के 1 मिनट बाद, 5 मिनट बाद और कभी-कभी 10 मिनट के बाद किया जाता है, जब बच्चा अपनी मां की छाती पर होता है.  इस टेस्ट में बच्चे की हार्ट बीट, सांसें, स्किन अपीयरेंस, मसल्स टोन और रिफ्लेक्सेस की माप की जाती है.  उच्चतम स्कोर 10 है. अगर यह स्कोर 7 या उससे अधिक आता है, तो समझना चाहिए आपका बच्चा नॉर्मल एक्ट कर रहा है.

 

जन्म के एक घंटे बाद डॉक्टर शिशु के हार्ट बीट्स,  बॉडी टेंप्रेचर, रेस्पिरेशन रेट  और मसल्स मूवमेंट के अलावा उसके बाई बर्थ डिजीज,रिएक्शंस और जॉन्डिस की भी जांच करते हैं.

 

जैसा कि हमारे समाज में भी माना जाता है, और डॉक्टर कहते हैं कि बच्चा पैदा होने के बाद रोना जरूर चाहिए जब बच्चा रोता है, तो उसके कई सारे मायने होते हैं. उसे स्वस्थ माना जाता है.

 

 साथ ही साथ बच्चे को छेड़ा भी जाता है हल्का सा उसे दर्द दिया जाता है, ताकि दर्द दिया जाता है ताकि उसका रिएक्शन चेक किया जा सके. बच्चे का तंत्रिका तंत्र सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं कर रहा है.  बच्चे का मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र साथ मिलकर काम कर रहे हैं या नहीं कर रहे हैं यह सब देखा जाता है.

 

साथी साहब डॉ यह भी जरूर कहती हैं कि माता को 24 घंटे के अंदर अंदर बच्चे को अपना दूध जरूर पिलाना चाहिए, और बच्चे को दूध पिलाना सिखाना भी चाहिए. यह अत्यधिक जरूरी होता है.

 

साथ ही साथ दूध पिलाने के मामले में बच्चे से जबरदस्ती नहीं करने की भी सलाह दी जाती है. कभी-कभी कई मामलों में ऐसा देखा गया है, कि दूध पीते समय बच्चा सांस ले लेता है, और श्वास नली में दूध जाने का डर रहता है.

 

हालांकि यह सिस्टम बाय डिफॉल्ट बच्चे के शरीर में काम करता है. ऐसा ना के बराबर ही होता है.

 

हमें इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि बच्चे के शरीर का तापमान अर्थात बाहरी तापमान 24 घंटे तक तो एक समान ही होना चाहिए. ऐसा नहीं है कि अभी आपने उसे पंखे की हवा में लिटा दिया उसके बाद उसे ऐसी की हवा में लेटा दिया या फिर उसे थोड़ा सा गर्म जगह पर रख दिया कोशिश करें तापमान एक जैसा ही रहे और थोड़ा गर्म रहे तो अच्छा है.

बच्चे का पहला भोजन माता का दूध ही होता है यह थोड़ा सा चिपचिपा और पीले रंग का होता है मां का पहला दूध कोलोस्ट्रकम कहलाता है.

 

इसमें कई प्रकार के एंटीबायोटिक्स होते हैं जो बच्चों को कई प्रकार की बीमारियों से पहले दिन से ही बचाने का कार्य करते हैं यह बच्चे के इम्यून सिस्टम को विकसित और उसे मजबूत बनाने में मदद करते हैं यह बच्चे के लिए परफेक्ट फूड माना जाता है.

 

आप यह सुनिश्चित जरूर करें कि आप अगले 1 साल तक अपने बच्चे को अपना दूध जरूर पिलाएं कोई भी पाउडर या डिब्बे का दूध मां के दूध का स्थान नहीं ले सकता.

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