पहली प्रेग्नेंसी और दूसरी प्रेगनेंसी के लक्षणों में अंतर

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 हम दूसरी प्रेगनेंसी को लेकर बात करने जा रहे हैं किस प्रकार से दूसरी प्रेगनेंसी पहली प्रेग्नेंसी से अलग होती है. कौन-कौन से लक्षण महिलाओं को अलग-अलग आ सकते हैं. कौन से लक्षण महिलाओं को जल्दी समझ में आते हैं.

पहली प्रेग्नेंसी के दौरान महिला के शरीर प्रेगनेंसी के लिए आदत नहीं होती है. महिलाओं को प्रेगनेंसी का कुछ भी अनुभव नहीं होता है. इस वजह से बहुत कुछ पहली प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं को पता नहीं चलता है, जो दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान महिलाएं सहजता से जान लेती है.

पहली प्रेगनेंसी में अक्सर महिलाएं डरती हैं.मन में अजीब-अजीब से ख्याल आते हैं, पता नहीं कैसे डिलीवरी होगी, कितना दर्द होगा, बच्चा हेल्दी होगा या नहीं, वजन बहुत बढ़ जाएगा तो कम कैसे होगा आदि. एक एक्सपीरियंस हो जाने के बाद दूसरी प्रेगनेंसी में इस प्रकार की भावनाएं महिलाओं के मन में लगभग ना के बराबर आती हैं.

पहली प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली कठिनाइयों को झेलने के बाद महिलाएं दूसरी प्रेगनेंसी में लगभग ना के बराबर तनाव लेती हैं. जो एक बहुत ही अच्छी बात है.

पहली प्रेग्नेंसी और दूसरी प्रेगनेंसी  के लक्षणों में अंतर

बेबी बंप

पहली प्रेग्नेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में काफी ज्यादा कसावट होती है. इसलिए बेबी बंप इतनी जल्दी दिखाई नहीं पड़ता है, जितनी जल्दी दूसरी प्रेगनेंसी में नजर आ जाता है. दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में मांसपेशियों की कसावट थोड़ी कमजोर हो जाती है. प्रेगनेंसी का उभार जल्दी नजर आता है. यह 10 से 15 दिन पहले ही नजर आ सकता है.

गर्भस्थ शिशु की हलचल

गर्भस्थ शिशु की हलचल से उसके स्वस्थ होने का पता चलता है. महिलाओं को पहली प्रेग्नेंसी के दौरान हलचल अधिक समझ में नहीं आती है, लेकिन दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान महिलाएं गर्भस्थ शिशु की हलचल पहली बार गर्भवती होने वाली महिलाओं की तुलना में 2 हफ्ते पहले ही महसूस कर सकती हैं.

लक्षणों की तीव्रता

दूसरी प्रेगनेंसी में लक्षणों की तीव्रता, उन से होने वाली परेशानी पहली प्रेग्नेंसी की तुलना में, दूसरी प्रेगनेंसी में थोड़ा कम ही महसूस होती है.

क्योंकि शरीर में यह क्षमता आ जाती है, कि वह हारमोंस के साइड इफेक्ट को कुछ हद तक कंट्रोल कर सके. इसलिए लक्षण इतने तीव्र नहीं महसूस होते हैं. दूसरा दूसरी प्रेगनेंसी तक महिलाओं को वह लक्षण हैबिट में भी आ जाते हैं. आप उनके लिए तैयार रहते हैं, तो इतनी दिक्कत नहीं होती है. और आपको लग सकता है कि लक्षण पहली प्रेग्नेंसी की तुलना में कमजोर हैं.

वजन बढ़ाना

पहली प्रेग्नेंसी में वजन बढ़ने का अनुभव महिलाओं को होता है, तो उन्हें ऐसा लग सकता है कि दूसरी प्रेगनेंसी में भी उनका वजन उसी प्रकार से बढ़ेगा. लेकिन ऐसा जरूरी नहीं होता है. कभी-कभी गर्भ में जेंडर परिवर्तन की वजह से वजन बढ़ने का पैटर्न बदल भी सकता है. इसलिए घबराने की आवश्यकता नहीं होती है. मात्र आप प्रेग्नेंसी पर नजर बनाए रखें और सावधानी उतनी ही आवश्यक होती है, जितनी पहली प्रेग्नेंसी के दौरान आपने रखी थी.

सामान्य रूप से यह देखा गया है कि पहली प्रेग्नेंसी की तुलना में दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान महिला का वजन थोड़ा सा अधिक ही बढ़ता है.

 पहली प्रेग्नेंसी के दौरान महिला के शरीर में कसावट बहुत ज्यादा होती है. इस
वजह से शरीर वजन बढ़ने का विरोध करता है, लेकिन दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान
महिला के शरीर का प्रतिरोध उतना नहीं होता है इस वजह से वजन पहली
प्रेग्नेंसी की तुलना में दूसरी प्रेगनेंसी में थोड़ा सा अधिक बढ़ता है.

शरीर में दर्द

पहली प्रेग्नेंसी की तुलना में दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान महिलाओं के शरीर में दर्द की समस्या थोड़ी सी अधिक रहती है क्योंकि पहली प्रेग्नेंसी में महिलाओं के सभी जोड़ मजबूत रहते हैं लेकिन दूसरी प्रेगनेंसी में शरीर की छमता थोड़ी सी तो कम हो ही जाती है. इस वजह से पहली प्रेग्नेंसी की तुलना में शरीर में दर्द की समस्या थोड़ा सा अधिक रहती है.

डिलीवरी में कम समय लगना

पहली प्रेग्नेंसी के दौरान महिला की डिलीवरी में जितना समय लगता है. दूसरी प्रेगनेंसी में डिलीवरी में इतना समय नहीं लगता है. इसका मुख्य कारण यही है, कि महिला की जो भी मांसपेशियां होती हैं. 

वह मांसपेशियां दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान उतनी ज्यादा खिंचाव लिए हुए नहीं होती हैं. वह अपनी ओरिजिनल स्थिति से थोड़ा प्रेगनेंसी के नजरिए से बदल जाते हैं, और दूसरी प्रेगनेंसी में इतना दर्द भी महसूस नहीं होता.

मनोवैज्ञानिक स्थिरता

दूसरी प्रेगनेंसी के दौरान भावनात्मक कारणों पर काफी ज्यादा रोक लग जाती है. उन से होने वाली समस्याएं महिलाओं को अक्सर दूसरी प्रेगनेंसी में नजर नहीं आती है. 

इसका मुख्य कारण यही होता है, कि महिलाओं को पहली प्रेग्नेंसी का अनुभव होने की वजह से अनिश्चितता की स्थिति समाप्त हो जाती है, और उन्हें प्रेगनेंसी की सारी प्रोसेस पता होने की वजह से भावनात्मक समस्याएं कम देखने में नजर आती हैं.

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